जब मैं 13 वर्ष की थी, तब मुझे पहली बार माहवारी आई थी। एक दिन स्कूल मेंअचानक दूसरे लेक्चर के दौरान मुझे अपनी माहवारी के आने का एहसास हुआ। हालांकि मुझे मेरी माँ ने पहले ही इसकी जानकारी दे दी थी, लेकिन कहते हैं न जब तक कोई घटना आपके साथ घट न जाये, तब तक आपको उसकी वास्तविकता का एहसास नहीं होता है। और जब वह घटना आपके साथ घट जाती है तब आप यह निश्चय नहीं कर पाते हैं, कि अब क्या करें। तो आप अब मेरी हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब मैं टॉय़लेट गयी और मैंने अपने अंडरवियर में खून के निशान देखे तब मेरी क्या हालत हुई होगी। वो तो अच्छा हुआ कि मेरी माँ भी उसी स्कूल में अध्यापिका थीं,इसलिए मैं सीधे उनके पास चली गई। लेकिन सबके पास तो यह सुविधा नहीं होती है। मैं तो यह सोच कर काँप जाती हूँ कि अगर मेरी माँ उस समय मेरे पास नहीं होतीं तब क्या हो सकता था।

मेरे पास तो कहीं आने-जाने की हिम्मत भी नहीं थी, वो भी इसलिए क्योंकि हमारे स्कूल में माहवारी की बात कोई भी खुलकर न तो करता था और न ही किसी और जगह इस बारे में बात करने के लिए हमें कोई प्रोत्साहन मिलता था। शुक्र है, मैं इन सबसे जल्दी ही बाहर आ गई।

माहवारी शिक्षा जरूरी है या नहीं, इस बात को कभी भी चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहिए। यह 21वीं सदी है। क्या आप जानते हैं कि पिछले दिनों, माहवारी पर बनी एक फिल्म ने ऑस्कर अवार्ड जीता है और हम अभी तक माहवारी संबंधी कोई बात नहीं कर सकते क्योंकि हम अभी ‘यह अच्छा नहीं लगता’ के नियम पर चल रहे हैं?

मेरे विचार में तो, माहवारी संबंधी शिक्षा, लड़के और लड़कियों, दोनों के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। लड़कियों को इसलिए इसका ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि यह उनके शरीर से संबन्धित है और उन्हें अपने शरीर की बनावट और उससे जुड़ी हर प्रकार की जानकारी का ज्ञान होना चाहिए। लड़कों को भी इससे जुड़ी सामान्य जानकारी का ज्ञान होना चाहिए। मैं यह नहीं कहती, कि मेरी क्लास के लड़कों को माहवारी संबंधी जानकारी नहीं होगी। पहले वो जो कुछ भी जानते थे, तो अधूरी और गलत जानकारी होती थी। माहवारी से जुड़ी जानकारी को वो लोग हंसी-मज़ाक और कुछ हद तक सेक्स से जोड़ कर बहुत हल्के में ही लेते थे। मुझे आज तक समझ नहीं आया, कि शरीर के एक अंग से निकलने वाला रक्त किस प्रकार सेक्स से जुड़ा हुआ हो सकता है।

जिफ़ी के मुख से

अब वो ही कमउम्र लड़के युवा पुरुष बन चुके हैं। मुझे पूरा यकीन है, कि माहवारी से जुड़ी उनकी वह अधूरी जानकारी अब पूरे और सुनिश्चित ज्ञान में बदल चुकी होगी, लेकिन उसके साथ जुड़ा वह भ्रम अभी भी वहीं है। शायद वो भूल चुके हैं कि किस प्रकार हमारे साथ होने वाली यह एक सामान्य घटना भ्रम और शंकाओं में फँसकर हमें बीमार जैसा महसूस करवाती है। हालांकि, कुछ लोगों ने जिंदगी के किसी मोड पर यह बात महसूस ज़रूर की होगी और इसके साथ ही उन्होनें इस बात को सामान्य रूप में स्वीकार कर लिया है। जहां पहले हमें इस बारे में न तो स्कूल और न ही घर में इस बारे में बात करने की इजाजत नहीं थी, वहीं अब हम लड़कियां भी अब इस बात के लिए काफी जागरूक हो गई हैं। 

इसलिए पहले जब लड़के इस बात को लेकर मज़ाक बनाते थे, हम उसका किसी प्रकार का कोई विरोध या जवाब नहीं दे पाते थे। हम उन्हें ठीक से जवाब देना नहीं जानते थे। क्या अब हम उन्हें बता सकते हैं, कि यह एक सामान्य बात है। लेकिन, अगर यह पहले भी सामान्य था, तब हमारे पिता जैसे लोगों ने इसके बारे में तब कोई बात क्यों नहीं करी? क्यों नहीं हम लोगों को इसके बारे में बात करने की इजाजत नहीं थी? यह सवाल हमें हमेशा परेशान करते थे। हमें आज भी जब वह दबी-ढँकी हंसी याद आती है, थोड़ी परेशानी महसूस होती है। वह अनुभव आज भी बहुत शर्मदायक और परेशान करने वाला होता था।

जिफ़ी के मुख से सौभाग्य से, आज मुझे माहवारी के संबंध में अच्छी समझ और जानकारी हो गई है। मुझे आज यह कहने में कोई शर्म नहीं है कि मुझे माहवारी हो रही है। मैं अब माहवारी संबंधी बात को मज़ाक में करने के लिए पुरुषों या महिलाओं से भी बात करने में हिचकती नहीं हूँ। लेकिन फिर भी मुझे लगता है, कि मुझे यह समझ काश पहले आ गई होती। इससे मैं उन पाँच दिनों स्कूल जाने में होने वाली परेशानी से अपने को बचा सकती थी। मुझे आज भी याद है कि मैं अपनी सहेली के कान में फुसफुसा कर पूछती थी कि वह देख कर बताए कि मेरी स्कर्ट में कहीं कोई दाग तो नहीं लगा है। मैं नहीं चाहती थी, कि वो लड़के जो हर समय किसी न किसी चोट के कारण स्वयं ही रक्त में लिपटे होते हैं वो मेरी स्कर्ट पर लगे किसी रक्त के निशान को देखें, जो बिना कोई चोट लगे आया है। आप समझ सकते हैं कि उस समय कितना शर्मनाक होता था। अब इसका अंत होना चाहिए। माहवारी के संबंध में सबको जानकारी होनी चाहिए।

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